Begusarai News : परिसीमन के बाद पंचायतों और वार्डों की सीमाओं में बदलाव हो सकता है, असर सीटों की संख्या पर ,जनसंख्या को सामान करने पर और साथ-साथ महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित करेगा इसी को विस्तार से समझने के लिए देखिए यह पूरी रिपोर्ट।
लोकसभा और विधानसभा सीटों पर पड़ सकता है असर
परिसीमन का सबसे बड़ा असर लोकसभा और विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों पर पड़ने की संभावना है। वर्तमान में लोकसभा में 543 निर्वाचित सीटें हैं। परिसीमन के बाद सीटों की संख्या बढ़ाने को लेकर अलग-अलग प्रस्तावों और अनुमानों में 850 तक सीटें होने की चर्चा सामने आती रही है।
इसका असर बिहार पर भी पड़ सकता है। वर्तमान में बिहार में 40 लोकसभा सीटें हैं। परिसीमन के बाद बिहार की लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ने की संभावना जताई जाती है। कुछ अनुमानों में यह संख्या 46 या उससे अधिक, जबकि कुछ चर्चाओं में 70 तक पहुंचने की संभावना बताई गई है।
हालांकि, सीटों की अंतिम संख्या और सीमाओं को लेकर आधिकारिक निर्णय परिसीमन की प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही स्पष्ट होगा।
हर वोट को लगभग समान प्रतिनिधित्व देने की कोशिश
परिसीमन का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य निर्वाचन क्षेत्रों में आबादी और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के बीच बेहतर संतुलन बनाना है। इसे अक्सर “One Person, One Vote, One Value” के सिद्धांत से जोड़ा जाता है।
अलग-अलग निर्वाचन क्षेत्रों में जनसंख्या का अंतर होने के कारण एक सांसद या विधायक दूसरे क्षेत्र की तुलना में काफी अधिक या कम आबादी का प्रतिनिधित्व कर सकता है। परिसीमन में निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को इस तरह निर्धारित करने का प्रयास किया जाता है कि प्रत्येक क्षेत्र में आबादी और प्रतिनिधित्व के बीच अधिक संतुलन हो।
उत्तर-दक्षिण का राजनीतिक संतुलन भी बड़ा मुद्दा
परिसीमन के साथ देश में उत्तर और दक्षिण के बीच राजनीतिक प्रतिनिधित्व का संतुलन भी एक महत्वपूर्ण मुद्दा बन सकता है।
जिन राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन किया है, वहां लोकसभा सीटों में अपेक्षाकृत कम बढ़ोतरी होने की आशंका जताई जाती है। वहीं बिहार, उत्तर प्रदेश और राजस्थान जैसे अधिक आबादी वाले राज्यों में सीटों की संख्या बढ़ने की संभावना पर चर्चा होती रही है।
इस वजह से परिसीमन सिर्फ चुनावी नक्शे का बदलाव नहीं, बल्कि देश के राजनीतिक प्रतिनिधित्व के संतुलन से जुड़ा महत्वपूर्ण विषय है।
SC/ST आरक्षित सीटों की सीमाएं भी बदल सकती हैं
परिसीमन का असर अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षित सीटों पर भी पड़ सकता है।
आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों का निर्धारण आबादी और परिसीमन के आधार पर किया जाता है। इसलिए निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं और जनसंख्या के आंकड़ों में बदलाव होने पर आरक्षित सीटों की संख्या और उनके क्षेत्र में भी बदलाव हो सकता है।
महिला आरक्षण पर भी पड़ेगा असर
परिसीमन का एक और महत्वपूर्ण पहलू महिला आरक्षण है। नारी शक्ति वंदन अधिनियम के तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किया गया है।
इस आरक्षण को लागू करने के लिए सीटों की पहचान और आरक्षण की प्रक्रिया परिसीमन से जुड़ी हुई है। ऐसे में परिसीमन के बाद यह महत्वपूर्ण होगा कि कौन-कौन से निर्वाचन क्षेत्र महिलाओं के लिए आरक्षित किए जाते हैं।
गांव से लेकर संसद तक बदल सकता है प्रतिनिधित्व
परिसीमन का असर सिर्फ दिल्ली की राजनीति तक सीमित नहीं रहेगा। इसका प्रभाव स्थानीय स्तर से लेकर विधानसभा और लोकसभा तक दिखाई दे सकता है।
निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं बदलने के बाद किसी गांव का विधानसभा क्षेत्र बदल सकता है, कोई क्षेत्र दूसरी लोकसभा सीट का हिस्सा बन सकता है और आरक्षण की स्थिति भी बदल सकती है।
यानी परिसीमन के बाद यह तय हो सकता है कि आपका गांव किस क्षेत्र में होगा, आपका विधानसभा क्षेत्र कौन सा होगा, आप किस लोकसभा सीट के लिए मतदान करेंगे और आपके क्षेत्र का राजनीतिक प्रतिनिधित्व किस तरह बदलेगा।
क्यों महत्वपूर्ण है परिसीमन?
परिसीमन सिर्फ कागज पर खींची जाने वाली नई सीमाएं नहीं हैं। इन सीमाओं के बदलने से देश के राजनीतिक प्रतिनिधित्व की तस्वीर बदल सकती है।बदलता हुआ चुनावी नक्शा आने वाली राजनीति की तस्वीर भी बदल सकता है। इसलिए परिसीमन को समझना हर मतदाता के लिए महत्वपूर्ण है।


