बेगूसराय: जिले में 700 एकड़ से ज्यादा कृषि योग्य जमीन की जमाबंदी रद्द किए जाने को लेकर किसानों का मामला एक बार फिर सामने आया है। संयुक्त किसान संघर्ष समिति, बरौनी के अध्यक्ष रोहित कुमार के नेतृत्व में किसानों के एक प्रतिनिधिमंडल ने केंद्रीय मंत्री सह बेगूसराय सांसद गिरिराज सिंह से मुलाकात कर अपनी समस्याएं रखीं।
किसानों ने मल्हीपुर, चकिया, विष्णुपुर चांद और बीहट क्षेत्र के रैयतों की जमाबंदी रद्द किए जाने पर आपत्ति जताई। किसानों का कहना है कि इन जमीनों से जुड़े पुराने राजस्व रिकॉर्ड मौजूद हैं और जमींदारी उन्मूलन के समय रैयतों के नाम जमीन के रिकॉर्ड में दर्ज किए गए थे। किसानों के अनुसार, वे लंबे समय से इन जमीनों पर खेती भी करते आ रहे हैं।
1925-26 के रिकॉर्ड और लगान रसीद का हवाला
संयुक्त किसान संघर्ष समिति की ओर से 28 अगस्त 2026 को दिए गए पत्र में किसानों ने मल्हीपुर मौजा की करीब 700 एकड़ जमीन की जमाबंदी रद्द किए जाने पर आपत्ति दर्ज कराई है।
पत्र में किसानों ने 1925-26 के जमींदारी रिकॉर्ड और दाखिल रिटर्न, रजिस्टर-2 में जमाबंदी तथा लंबे समय से जारी लगान रसीदों का हवाला दिया है। किसानों का दावा है कि पुराने रिकॉर्ड के आधार पर रैयतों के नाम जमीन दर्ज हुए और उन्हें जमीन का लगान भी दिया जाता रहा।
किसानों का कहना है कि अचानक जमाबंदी रद्द किए जाने से उनके जमीन के अधिकार को लेकर गंभीर स्थिति पैदा हो गई है।
हालांकि, किसानों द्वारा पेश किए गए इन दावों और दस्तावेजों के आधार पर जमीन के अंतिम स्वामित्व का निष्कर्ष निकालना संबंधित राजस्व प्राधिकारी और न्यायालय के अधिकार क्षेत्र का विषय है।
गिरिराज सिंह ने DM को दिया हस्तलिखित आदेश
किसानों की मांग सुनने के बाद केंद्रीय मंत्री सह सांसद गिरिराज सिंह ने जिलाधिकारी को हस्तलिखित आदेश देते हुए किसानों से वार्ता कर आवश्यक कार्रवाई करने को कहा है।
अब इस आदेश के बाद प्रशासन की अगली कार्रवाई पर नजर है।
किसानों का सवाल है कि अगर जमीन से जुड़े पुराने रिकॉर्ड और जमाबंदी को लेकर उनके दावे हैं, तो क्या प्रशासन इन दस्तावेजों की दोबारा जांच करेगा? क्या जमाबंदी रद्द किए जाने के आधार को किसानों के सामने स्पष्ट किया जाएगा?
दिनकर विश्वविद्यालय और NIFT की जमीन पर भी सवाल
मल्हीपुर की जमीन का मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण हो गया है क्योंकि इसी इलाके में दिनकर विश्वविद्यालय के स्थायी परिसर के लिए 15 एकड़ जमीन चिह्नित किए जाने की जानकारी सामने आई है।
इसके अलावा इसी क्षेत्र में NIFT के लिए भी जमीन उपलब्ध कराए जाने की प्रक्रिया की बात सामने आ चुकी है।
ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जिस क्षेत्र की कृषि योग्य जमीन को लेकर किसानों और प्रशासन के बीच विवाद है, वहां प्रस्तावित बड़े संस्थानों के लिए चिह्नित जमीन की वास्तविक राजस्व और कानूनी स्थिति क्या है।
- क्या दिनकर विश्वविद्यालय और NIFT के लिए चिह्नित जमीन पूरी तरह विवादमुक्त है?
- क्या किसानों के दावे वाली जमीन और प्रस्तावित संस्थानों की जमीन अलग-अलग है?
- और अगर दोनों अलग हैं, तो उनका स्पष्ट सीमांकन और नजरी नक्शा क्या है?
अब DM से बातचीत पर टिकी नजर
केंद्रीय मंत्री के निर्देश के बाद अब जिलाधिकारी और किसानों के बीच होने वाली संभावित वार्ता महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या यह बातचीत केवल किसानों की शिकायत सुनने तक सीमित रहेगी या पुराने राजस्व रिकॉर्ड, रजिस्टर-2, जमाबंदी, लगान रसीद और वर्तमान सरकारी रिकॉर्ड की भी विस्तृत जांच होगी।
एक तरफ दिनकर विश्वविद्यालय और NIFT जैसे संस्थानों को बेगूसराय के विकास, शिक्षा और युवाओं के भविष्य से जोड़कर देखा जा रहा है। दूसरी तरफ किसान अपनी जमीन और उससे जुड़े अधिकारों को लेकर संघर्ष कर रहे हैं।
ऐसे में अब जरूरत इस बात की है कि जमीन के रिकॉर्ड और उसके कानूनी दर्जे की स्थिति प्रशासन की ओर से स्पष्ट की जाए, ताकि विकास परियोजनाओं और किसानों के दावों के बीच कोई स्थायी समाधान निकाला जा सके।
The Begusarai इस मामले में किसानों, प्रशासन और संबंधित पक्षों का पक्ष सामने लाने की कोशिश करता रहेगा।


