Jayamangala Garh : बेगूसराय के ऐतिहासिक और धार्मिक स्थल जयमंगला गढ़ में इन दिनों ‘विकास बनाम विस्थापन’ का मुद्दा सुलग रहा है। प्रशासन जहाँ काबर झील और जयमंगला गढ़ को धार्मिक इको-टूरिज्म हब के रूप में विकसित करने की बात कर रहा है, वहीं दशकों से यहाँ बसे लगभग 300 मुसहर परिवारों के माथे पर बेघर होने की चिंता की लकीरें गहरी हो गई हैं। फिलहाल पटना हाईकोर्ट ने विस्थापन की कवायद पर रोक लगाकर राहत तो दी है, लेकिन डर अब भी बरकरार है।
दशकों पुरानी जड़ें और सरकारी विरोधाभास
विस्थापन का सामना कर रहे जयमंगला गढ़ पंचायत-3 के निवासियों का तर्क प्रशासन की कार्यशैली पर बड़े सवाल खड़े करता है। ग्रामीणों के अनुसार-
- दस्तावेजी प्रमाण : उन्हें 1968-69 में सरकारी अधिकारियों द्वारा जमीन का पर्चा दिया गया था।
- सरकारी निवेश : 1964-65 में सर्वोदय कार्यक्रम के तहत यहाँ घर बने, 1986-88 में ‘इंदिरा आवास’ के तहत पक्के मकान दिए गए और 1993 में बना स्कूल आज +2 हाई स्कूल में तब्दील हो चुका है।
- बुनियादी ढांचा : यहाँ आंगनबाड़ी केंद्र और सरकारी बैठका जैसे स्थायी निर्माण हैं।
सवाल यह उठता है कि जिस बस्ती को सरकार ने खुद दशकों तक टैक्स के पैसों से संवारा और बसाया, उसे आज अचानक ‘अवैध’ या ‘बाधा’ मानकर उजाड़ने की जरूरत क्यों आन पड़ी?
इको-टूरिज्म या ‘राशि की बंदरबांट’?
प्रशासन का पक्ष है कि अंतरराष्ट्रीय महत्व की काबर झील और जयमंगला गढ़ को पर्यटन के मानचित्र पर लाने के लिए इस क्षेत्र को खाली कराना आवश्यक है। लेकिन स्थानीय लोगों और सीपीआई (माले) जैसे राजनीतिक दलों का आरोप है कि यह विकास नहीं, बल्कि कॉरपोरेट घरानों को जमीन सौंपने और सरकारी फंड की बंदरबांट का खेल है।
आरोप है कि बिना उचित मुआवजे और वैकल्पिक रोजगार के किसानों की खड़ी फसल जोत दी गई और उन्हें अपनी ही जमीन से बेदखल किया जा रहा है। काबर झील से जुड़ी मुसहर समुदाय की आजीविका (मछली पालन, नाव संचालन, मजदूरी) इस विस्थापन से पूरी तरह नष्ट हो जाएगी।
सियासत की चुप्पी और अधिकारियों की मनमानी
इस पूरे प्रकरण में क्षेत्रीय जनप्रतिनिधियों की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। ग्रामीणों का कहना है कि विधायक, सांसद और मंत्री इस मानवीय त्रासदी को समझने के बजाय अधिकारियों की फाइलों पर ज्यादा भरोसा कर रहे हैं। क्या बेगूसराय का नेतृत्व विकास के ऐसे मॉडल का समर्थन करेगा जो 1500 की आबादी वाले एक पूरे गांव का अस्तित्व ही मिटा दे?
“हम यहाँ पीढ़ियों से रह रहे हैं। यहीं हमारी रोजी-रोटी है और यहीं हमारे बच्चों का स्कूल। हमें पर्यटन के नाम पर उजाड़ना न्याय नहीं, बल्कि हमारे अधिकारों का हनन है।”- स्थानीय निवासी
हाईकोर्ट से आस, भविष्य पर संशय
पटना हाईकोर्ट के हस्तक्षेप ने फिलहाल बुलडोजर की कार्रवाई को थाम दिया है, लेकिन व्यावहारिक धरातल पर संकट टला नहीं है। अधिकारियों द्वारा नोटिस तामिला कराने की प्रक्रिया जारी रहने से समाज में आक्रोश है। ‘न्याय के साथ विकास’ का दावा करने वाली सरकार के लिए जयमंगला गढ़ की यह मुसहर बस्ती एक लिटमस टेस्ट की तरह है।
रिपोर्ट- महेश भारती….

