Desk : बिहार विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद कांग्रेस ने कारणों की तलाश शुरू कर दी है। पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने दिल्ली में हार चुके उम्मीदवारों से मुलाक़ात कर विस्तृत फीडबैक लेना आरंभ कर दिया है। प्रारम्भिक संकेतों के अनुसार, कांग्रेस नेतृत्व महागठबंधन के भीतर सहयोगी दलों के रवैये और कई सीटों पर हुए ‘दोस्ताना संघर्ष’ को हार का अहम कारण मान रहा है।
सूत्रों का कहना है कि महागठबंधन के घटक दलों के समर्थकों ने कई क्षेत्रों में कांग्रेस प्रत्याशियों को समर्थन देने के बजाय सहयोगी दलों के उम्मीदवारों की तरफ झुकाव दिखाया। इस वजह से कांग्रेस के कई उम्मीदवार चुनावी मैदान में कमजोर पड़ गए। कुछ सीटों पर CPI और RJD के प्रत्याशियों के साथ सीधे अथवा परोक्ष मुकाबले ने भी कांग्रेस को नुकसान पहुँचाया।
पार्टी के वरिष्ठ नेताओं का मानना है कि यदि कांग्रेस बिहार में अकेले चुनाव लड़ती, तो उसे गठबंधन के मुकाबले अधिक सीटें मिल सकती थीं। वर्ष 1990 और 1995 में सत्ता से दूर रहने के बावजूद कांग्रेस बिहार में मजबूत विपक्ष रही, लेकिन वर्ष 2000 के बाद राजद के साथ तालमेल और गठबंधन की राजनीति के चलते पार्टी का जनाधार लगातार सिमटता गया। संगठन के भीतर यह असंतोष भी लंबे समय से मौजूद है कि प्रदेश नेतृत्व के चयन में राजद की पसंद को प्राथमिकता दी जाती रही है, जिससे कई सक्षम नेता किनारे होते गए। इनमें से कुछ नेता समय के साथ अन्य दलों में भी चले गए।
हार के बाद अब कांग्रेस के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या वह बिहार में राजद से अलग होकर स्वतंत्र राजनीतिक राह चुनेगी। राज्य में कांग्रेस का व्यापक संगठन, हर जिले में कार्यालय और चुनाव लड़ने की क्षमता रखने वाले अनेक नेता मौजूद हैं, लेकिन गठबंधन की राजनीति में इन संसाधनों का पूरा उपयोग नहीं हो पाता।
पार्टी अब यह भी आकलन कर रही है कि क्या वह अपने पारंपरिक दलित–मुस्लिम–सवर्ण समीकरण के सहारे भविष्य में मजबूती हासिल कर सकती है या फिर एनडीए के प्रभावी वोट बैंक के सामने अकेले खड़े होने का जोखिम उठाना मुश्किल होगा।
बिहार कांग्रेस की इस मंथन प्रक्रिया के बीच अब राजनीतिक हलकों में यह चर्चा तेज है कि पार्टी आने वाले लोकसभा और विधानसभा चुनावों में नई राह अख्तियार करेगी या फिर महागठबंधन के पुराने ढर्रे पर ही आगे बढ़ेगी।

