बिहार के इस जिले से मां सीता ने की थी सबसे पहले छठ पर्व की शुरुआत, आज भी मौजूद है पैर के चरण! जानें-

MAA SITA CHATTH

डेस्क: त्योहारों के देश भारत में कई ऐसे पर्व हैं, जिन्हें काफी कठिन माना जाता है और इन्हीं में से एक है लोक आस्था का महापर्व छठ.. जिसे रामायण और महाभारत काल से ही मनाने की परंपरा रही है। हिंदू पंचांग के अनुसार, छठ हर वर्ष कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी यानी छठी तिथि को मनाया जाने वाला एक हिन्दू महा पर्व है।

मुंगेर के कष्टहरणी घाट यहां से है 3 किलोमीटर

सूर्योपासना का यह अनुपम लोकपर्व मुख्य रूप से बिहार, झारखण्ड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्रों में मनाया जाता है। लेकिन अब धीरे-धीरे पूरे देश में इसके महत्व को स्वीकार कर लिया गया है। कहा जाता है यह पर्व बिहारीयों का सबसे बड़ा पर्व है ये उनकी संस्कृति है। बिहार में कोई भी पर्व धूमधाम से हो या ना हो लेकिन छठ पूजा को बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है।

मुंगेर के सीता चरण से शुरू हुआ यह पर्व:

कहा ये भी जाता है कि यह महापर्व वैदिक काल से ही चला आ रहा है और ये बिहार कि संस्कृति बन चुका हैं। लेकिन, इसी कड़ी में एक नाम बिहार के मुंगेर (Munger) का भी है, धार्मिंक मान्यताओं के अनुसार, रामायण (Ramayan) काल में माता सीता ने पहला छठ पूजन बिहार के मुंगेर में गंगा तट पर संपन्न किया था, इसके प्रमाण स्वरूप यहां आज भी माता सीता के अस्तचलगामी सूर्य और उदयमान सूर्य को अर्घ्य देते चरण चिह्न मौजूद हैं।

सीता मां चरण का (फाइल फोटो)

गंगा के गर्भ में बसा है यह मंदिर:

वही सीता के चरण पर कई वर्षों से शोध कर रहे पंडित कौशल किशोर पाठक बताते हैं कि “आनंद रामायण के पृष्ठ संख्या 33 से 36 तक सीता चरण और मुंगेर के बारे में उल्लेख किया गया है, आनंद रामायण के अनुसार, मुंगेर जिला के बबुआ घाट से तीन किलोमीटर (3 KM) गंगा के बीच में पर्वत पर ऋषि मुद्गल के आश्रम में मां सीता ने छठ पूजन किया था, वह स्थान वर्तमान में सीता चरण मंदिर के नाम से जाना जाता है, जो आज भी मां सीता के छठ पर्व की कहानी को दोहराता है।

चारों तरफ गंगा नदी बीच में मंदिर

वनवास से लौटने के क्रम में मां सीता ने किया था यह पर्व:

हिंदू धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक, 14 वर्ष वनवास के बाद जब भगवान राम अयोध्या लौट रहे थे। तब उन्होंने रामराज्य के लिए राजसूर्य यज्ञ करने का निर्णय लिया, यज्ञ शुरू करने से पहले उन्हें वाल्मीकि ऋषि ने कहा कि मुद्गल ऋषि के आये बिना यह राजसूर्य यज्ञ सफल नहीं हो सकता है। इसके बाद ही श्रीराम सीता माता सहित मुद्गल ऋषि के आश्रम पहुंचे, जहां मुद्गल ऋषि ने ही माता सीता को यह सलाह दी थी कि वह छठ व्रत पूरा करें।

सीता मां के पैर के निशान

रावण वध के दोष मुक्त के लिए भगवान राम ने किया था, यज्ञ

आनंद रामायण के मुताबिक, भगवान राम द्वारा रावण का वध किया गया था, चूंकि रावण एक ब्रह्मण था इसलिए राम को ब्रह्म हत्या का पाप लगा। इस ब्रह्म हत्या से पापमुक्ति के लिए अयोध्या के कुलगुरु मुनि वशिष्ठ ने मुगदलपुरी (वर्तमान में मुंगेर) में ऋषि मुद्गल के पास राम-सीता को भेजा, भगवान राम को ऋषि मुद्गल ने वर्तमान कष्टहरणी घाट में ब्रह्महत्या मुक्ति यज्ञ करवाया और माता सीता को अपने आश्रम में ही रहने का आदेश दिया।

आज भी मौजूद है मां सीता के पैर के निशान:

क्योंकि उस समय कोई भी महिलाएं यज्ञ में भाग नहीं ले सकती थी, इसलिए माता सीता ने ऋषि मुद्गल के आश्रम में रहकर ही उनके निर्देश पर व्रत किया, सूर्य उपासना के दौरान मां सीता ने अस्ताचलगामी सूर्य को पश्चिम दिशा की ओर और उदीयमान सूर्य को पूरब दिशा की ओर अर्घ्य दिया था, आज भी मंदिर के गर्भ गृह में पश्चिम और पूरब दिशा की ओर माता सीता के पैरों के निशान मौजूद हैं।

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