पिछड़े और दलित नेतृत्व की प्रतियोगिता का गवाह बना है बिहार का विधानसभा चुनाव, इस बार सवर्ण वोट पर सबकी नजर

पोलिटिकल डेस्क : बिहार विधानसभा 2020 का चुनाव पिछड़े और दलित नेताओं के आपसी प्रतियोगिता का गवाह बनता नजर आ रहा है। कभी स्वर्णों को गाली पढ़कर और आलोचना करते थकने नहीं वाले नेता सत्ता में पहुंचे थे। जिन सवर्ण वाद की आलोचना कर ऐसे नेता संसद, विधानसभा और सरकार में पहुंचे वे सवर्ण नेता आज बिहार की राजनीति या बिहार की सत्ता के केन्द्र में कहीं नजर नहीं आ रहे हैं।कहीं हैं भी तो उन पिछड़े या दलित नेताओं की जयकारे लगाने में या फिर उनके कृपा प्रसाद पाने की गुंजाइश खोजते।

जिससे सत्ता में और कुछ पहुंच की संभावना बन सके। राज्य की मुख्य पार्टियों में कोई सवर्ण नेता की इतनी हैसियत नहीं कि वह किसी को दल का टिकट दिला सके या उसके पक्ष में आवाज उठा सकें। हां, धनाढ्य रहने की वजह से टिकटों की खरीद बिक्री का दलीय एजेऐया फिर चाकरी सुरक्षित रखने के लिए प्रवक्ताओं के पद पर जरूर मिल जा रहे हैं। व्यक्तिवादी और परिवार वादी दल में न कोई संसदीय बोर्ड है न लोकतांत्रिक आचरण। न कोई विजन है न विकास की अवधारणा। कुछ है तो वह है स्वार्थ और परिवार वाद के कुनबों को बढ़ाना और जातीयता और धार्मिक धुर्वीकरण को बनाए रखकर अपनी विधानमंडल और संसद की सीटों की सुरक्षित रखने का समीकरण । पिछले 30 बरसों से बिहार की राजनीति इसी परिधि पर घूम रही है। आज भी घूम रही है। 2020 के विधानसभा चुनाव में भी धरातलीय सच विकास की राजनीति से कोसों दूर जातीय समीकरण को साधने का ही बनता नजर आ रहा है।

सत्ता की इस बिहारी लड़ाई में 1991 और 1995 के लालू प्रसाद के चुनावी मंच को जब याद करेंगे तो मामला स्पष्ट हो जाएगा। उस समय के चुनाव के मंच पर जब लालू यादव भाषण देते थे तो एक कुर्सी पर बैठकर। वे अक्सर कहा करते थे कि यह कुर्सी मैं इसलिए नहीं छोड़ता हूं कि कोई मिसिर जी आकर इसपर न बैठ जाएं। वे समर्थकों का आह्वान करते थे कि यह कुर्सी छीनने की लड़ाई है। तब बिहार में कांग्रेस के नेता जगन्नाथ मिश्र हुआ करते थे। लालू जी की कुर्सी चारा घोटाले की भेंट चढ़ गई और उन्होंने दूसरे के लिए कुर्सी नहीं छोड़ी। अपनी पत्नी को दिया फिर बेटी और अब उनके बेटे राजनीति में उनके वारिश बन सत्ता सुख भोग रहे हैं। लेकिन,उनकी कुर्सी किसी मिसिर जी ने नहीं पिछड़ी जातियों से ही आनेवाले कुर्मी कोयरी के समीकरण बनाकर नीतीश कुमार ने छीन लिए। बिहार में सत्ता समीकरण के इस उभार ने हर जातियों को नेता बनने का हिलकोरा पैदा कर दिया सवर्ण नेता राजनीति से गायब हो गए।

दलित और पिछड़े के नेता अपना अपना दल बनाने लगे और उनकी जात के मतदाताओं के वे स्वयंभू ठेकेदार बन गए। कुशवाहा का दल, सहनी का दल , मांझी का दल, पासवान का दल, यादव , मुस्लिम का दल,भिन्न भिन्न जातियों के नेता,जाति समीकरण के दल । राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दल इनके इर्द-गिर्द नाचने लगे। बारगेनिंग सत्ता का, सीटों का , सामाजिक समीकरण का जोड़-तोड़ का ,निर्ललजता का चलने लगा। चुनाव में टिकट झटकने की प्रतियोगिता शुरू हुई। टिकट बेचने का धंधा पनप गया। हर दल के नेता इस खेल में शामिल होते गए। लोकतंत्र विचारों से अलग हटकर व्यापार की शक्ल ग्रहण कर लिया। पिछड़े और दलित उभार के नेता भ्रष्टाचार, योजनाओं की लूट और सत्ता के सहारे अकूत संपत्ति के स्वामी बन गए।

बिहार का यह चुनाव ऐसे ही राजनीतिक जातीय समीकरण के बीच है। जहां अब पिछड़े और दलित वोटों का जोड़-तोड़ नहीं है। स्वर्णों के मत हासिल करने की होड़ है। महागठबंधन हों या एनडीए , पप्पू यादव हों या उपेन्द्र कुशवाहा सबकी नजर सवर्ण वोट पर है। पिछड़े और दलित के नेता तो सब हैं ही। सवर्ण वोटर नेता विहीन बन उनके पीछे हो सकते हैं। समीकरण की इसी लड़ाई ने नीतीश को लोजपा से ,लालू से नीतीश को, मांझी को पासवान से कुशवाहा को नीतीश से पप्पू यादव को तेजस्वी यादव से अलग कर दिया है। चिराग, तेजस्वी, नीतीश, कुशवाहा,पप्पू , मांझी की सत्ता के केन्द्र की प्रतियोगिता में सवर्ण तब भु थे ,अब भी हैं ।।तब चुनौती थे और अब पासंग हैं। जिसके साथ उसकी सरकार। सबका साथ सबकी सरकार का नारा वक्त की उपज है। बिहार 2020 का सामाजिक विजन दूर तक परिलक्षित होगा

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