होली के रंग में रंगा बाजार में बढ़ी चहल पहल , आज है होलिका दहन

Holika Dahan

न्यूज डेस्क , धर्म कर्म : फाल्गुन महीने के शुरुआत से ही देश दुनिया में हिंदू मान्यताओं को मानने वाले अमूमन सभी लोग होली महोत्सव मनाना प्रारंभ कर देते हैं इसको लेकर के खासा उत्साह देखने को मिल रहा है एक तरफ कला संस्कृति लेखन क्षेत्र से जुड़े हुए लोग कवि सम्मेलन आदि के माध्यम से अपने सांस्कृतिक उद्गार को व्यक्त करने में लगे हैं तो दूसरी ओर विभिन्न थाना क्षेत्र के पुलिस पदाधिकारियों के द्वारा कोरोना के नए संक्रमण को देखते हुए शांति समिति बैठक के माध्यम से नई गाइडलाइन जारी की जा रही है.

जिसके अंतर्गत सामूहिक उत्सव से लोगों को बचने की सलाह दी जा रही है। फिर भी बाजारों से लेकर गांव तक रंग अबीर पिचकारी की बाजार सजने लगे हैं कपड़ों की दुकानों पर भी होली को लेकर खासी भीड़ देखी जा रही है अब आगे यह देखना होगा कि प्रशासनिक गाइडलाइन के आगे सांस्कृतिक उत्सव कितना भारी पड़ता है। होलिका दहन एवं होली के संदर्भ में पौराणिक ज्योत के संदर्भ में अपना विचार है व्यक्त करते हुए जिले के प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य आचार्य अविनाश शास्त्री ने कहा कि मथुरा वृंदावन आदि क्षेत्रों में रंगो की होली के साथ साथ फूलों की होली फलों की होली का भी प्रचलन है होली के लिए भगवान श्री कृष्ण के मंदिरों में खास करके विशेष तैयारियां की जाती हैं ।

और पूरे फाल्गुन मास अलग-अलग तिथियों के अनुसार अलग-अलग रंग उत्सव मनाया जा रहा है चुकी होलिका दहन के पीछे भक्त प्रल्हाद एवं विष्णु की भक्ति की कथा प्रचलित है इसलिए वैष्णव लोगों के द्वारा होलिकोत्सव को लेकर विशेष उत्साह रहता है ज्योतिषीय मत के अनुसार फाल्गुन शुक्ल पक्ष की रात्रि को होलिका दहन हुआ था और प्रतिवर्ष फाल्गुन शुक्ल पक्ष को ही होलिका दहन की परंपरा भी है इसके अनुसार इस वर्ष 28 मार्च 2021 को रात्रि काल में होलिका का दहन होगा लेकिन इस वर्ष अर्धरात्रि के बजाय सायं सूर्यास्त के पश्चात यानी 6:06 के बाद 7:42 तक ही होलिका दहन करना चाहिए जोकि समृद्धि एवं सर्व कल्याणकारी होगा। यह पूर्व से ही विदित है कि चैत्र कृष्ण पक्ष प्रतिपदा को होली होती है यानी इस वर्ष होली का उत्सव 29 मार्च 2021 को मनाया जाएगा होली के उत्सव में होलिका दहन में जली हुई भस्म को धारण करना चाहिए।

होलिकाभस्मधारणमन्त्र
।।वंदितासी सुरेन्द्रेण ब्रह्मचुतशिवादिभिः। अतस्त्वं पाहि नो भीतेरभूषिता भूतिदा भव।।

कई मान्यताओं के अनुसार संवत का जलना साल का बदलना भी है इसलिए कई लोग इस प्रतीक्षा में भी रहते हैं कि संवत जलने के बाद नए साल में नए वर्ष में हैं कार्यों को आरंभ कर सके। कई संप्रदायों में होलिका दहन के पश्चात होली के दिन सख्त डोर बांधने की भी धार्मिक परंपरा है।

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