10 जून को है वट सावित्री व्रत और ज्येष्ठ अमावस्या तो आइए जानें पूजा विधि , शुभ मुहुर्त और पूजन का महत्व…

Vat Savitri

न्यूज डेस्क : हिन्दू कैलेंडर के अनुसार हर महीने पूर्णिमा और अमावस्या आती है। अमावस्या का दिन पुण्य के लिए जाना जाता है। इस दिन पितरों की शांति के लिए लोग पिंड दान, तर्पण जैसे कार्य करते हैं। वहीं ज्येष्ठ माह की अमावस्या का महत्व सबसे अधिक बताया जाता है। सौभाग्यवती स्त्रियों के लिए वटसावित्री का व्रत अखण्ड सौभाग्य को देने वाला होता है एवं पति दीर्घायु प्राप्त करते है इस लिए ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष अमावस्या को अखण्ड सौभाग्य धन धान्य सुख समृद्धि की इच्छा पूर्ति के लिए बरगद वृक्ष के जड़ में पूजन करना चाहिए।

ज्येष्ठ अमावस्या का शुभ मुहूर्त :

ज्येष्ठ अमावस्या तिथि – उदयकालिक 10 जून 2021
वट सावित्री व्रत – 10 जून 2021

ज्येष्ठ अमावस्या तिथि आरंभ – (09 जून2021) दिन के 1 बजकर 28 मि से
ज्येष्ठ अमावस्या तिथि समाप्त – (10 जून 2021) दिन के 3 बजकर 24 मिंट तक

वट सावित्री व्रत के शुभ मुहूर्त के संदर्भ में ज्योतिष आचार्य अविनाश शास्त्री ने बताया कि अमावस्या तिथि 9 जून 2021 दिन बुधवार को दिन के 1:28 से ही प्रारंभ हो जाएगी लेकिन उदय कालिक अमावस्या तिथि 10 जून 2021 दिन गुरुवार को ही है तिथि निर्णय के अनुसार उदय कालिका अमावस्या तिथि ही ग्रहण करना चाहिए ऐसा शास्त्रों का निर्णय है। अतः वट सावित्री व्रत 10 जून 2021 दिन गुरुवार को ही होना उचित है।

वट सावित्री व्रत पूजा-विधि :

  1. वट सावित्री व्रत के दिन सुबह उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
  2. अब व्रत का संकल्प लें।
  3. 24 बरगद फल, और 24 पूरियां अपने आंचल में रखकर वट वृक्ष के लिए जाएं।
  4. 12 पूरियां और 12 बरगद फल वट वृक्ष पर चढ़ा दें।
  5. इसके बाद एक लोटा जल चढ़ाएं।
  6. वृक्ष पर हल्दी, रोली और अक्षत लगाएं।
  7. फल-मिठाई अर्पित करें।
  8. धूप-दीप दान करें।
  9. कच्चे सूत को लपेटते हुए 12 बार परिक्रमा करें।
  10. हर परिक्रमा के बाद भीगा चना चढ़ाते जाएं।
  11. अब व्रत कथा पढ़ें।
  12. फिर 12 कच्चे धागे वाली माला वृक्ष पर चढ़ाएं और दूसरी खुद पहनने पर भी नहीं लें।
  13. 6 बार इस माला को वृक्ष से बदलें।
  14. उसके बाद पूजा करते हुए भगवान से पति के लिए लंबी उम्र और अच्छे स्वास्थ्य की कामना करें।
  15. फिर सावित्री मां से आशीर्वाद लें और पेड़ के चारों ओर कच्चे धागे से या मोली को 7 बार बांधे। फिर पति के पैर धो कर आशीर्वाद लें।
  16. बाद में 11 चने और वट वृक्ष की लाल रंग की कली को पानी से निगलकर अपना व्रत खोलें

ज्योतिष आचार्य अविनाश शास्त्री कहते हैं की वटसावित्री व्रत के दिन वटवृक्ष में मूल में विवाहिता सौभाग्यवती को सुवर्णमयी सावित्री देवी की प्रतिमा सप्तधान्य पर स्थापित करके पूजन करना चाहिए।पूजन में देश काल मे उतपन्न फल पुष्प नेवैद्य धूप दीप आदि से सत्यवती सावित्री का पूजन करना चाहिए ततपश्चात अन्न वस्त्रादि ब्राह्मण को निवेदित करते हुए पति के दीर्घायु होने का आशीर्वाद प्राप्त करना चाहिए। व्रत के एक दिन पूर्व यानि चतुर्दशी को एकभुक्त सात्विक आहार ग्रहण करते हुए दूसरे दिन अर्थात अमावस को व्रत रखना चाहिए और ज्येष्ठ शुक्ल प्रतिपदा यानी 11 जून 2021 शुक्रवार को प्रातः स्नान आदि नित्य पूजनादि कर्मो से निवृत होकर ब्राह्मण भोजन दान आदिं निवेदित करते हुए स्वयं भोजन पारण करना चाहिए। मिथिला में नवविवाहिता स्त्रियों के लिए यह वटसावित्री का व्रत किसी महोत्सव से कम नही होता। नव विवाहिता स्त्रियों में वरसात पूजन को लेकर विशेष तैयारियां देखी जाती है। बांस की डोली,बांस के पंखे से वटवृक्ष का पूजन करती है। पूजन के लिए घरों से जब निकल कर वटवृक्ष के समीप जाती है तो माथे पर बहुरंगी कलशों में जल भरकर समूह में मंगलगीत गाती हुई जाती है।आज भी यह सांस्कृतिक परम्परा ग्रामीण क्षेत्रो में नही बल्कि कस्बाई इलाको में भी देखने को मिलता है।

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