बैंक खाते से धोखे से निकाल लिए पैसे तो घबराने की नहीं है जरूरत, 3 दिन के भीतर करें शिकायत, जानें क्या कहता है नियम

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न्यूज डेस्क : बैंको में होने वाले ऑनलाइन काम जहाँ एक तरफ काफी सुविधाजनक हुए हैं। तो वहीं बहुत लोगों को नुकसान का सामना करना पड़ता है। हाल में देखा जाय टबऑनलाइन फ्रॉड के मामले काफी बढ़ गए हैं। ये मामले शहर से लेकर गांव तक घटित होने लगे हैं। ऐसे में जो लोग इस प्रकार के मामले के शिकार होते हैं, उन्हें काफी चिंता सताने लगती है। ऐसी स्थिति में बड़ा सवाल पैदा होता है, कि जिनके बैंक एकाउंट से हैकर पैसे हैक कर लेता है तो पैसे की सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी बनेगी, बैंक की या खाता धारक की?

बैंक की होगी जिम्मेदारी जानिए क्या आया फैसला राष्ट्रीय उपभोक्ता निवारण आयोग के जज सी विश्वनाथ ने हाल ही में इस से संबंधित एक अहम फैसला सुनाते हुए कहा है, कि पैसे हैक होने की स्थिति में जिम्मेदारी बैंक की बनेगी। बैंक की जिम्मेदारी कब और किन परिस्थितियों में बनेगी, किस तरह बनेगी ये बात बैंक में एकाउंट रखने वाले हर व्यक्ति के लिए जान न आवश्यक है ताकि भविष्य में अगर उनके साथ कोई गड़बड़ी हो तो बिना किसी परेशानी में पड़े अपनी समस्या का समाधान करवा सके। बैंक में किसी भी तरह का ऑनलाइन या ऑफलाइन फ़्रॉड अगर किसी उपभोक्ता के साथ होता है। तो वो इसकी शिकायत उपभोक्ता संरक्षण में कर सकता है तथा सही मुआवजा पा सकता है।

क्या है उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम वर्ष 1986 में लाया गया पर 2019 में इसे संशोधित किया गया और तब के उपभोक्ता मामले,खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्री श्री रामविलास पासवान द्वारा पेश किया गया था। इसके अंतर्गत कई ऐसे प्रावधान जिनमे काफी आसान तरीके से कोई व्यक्ति अगर फ्रॉड का शिकार बन गया है तो अपनी शिकायत दर्ज सक्षम निवारण केंद्र पर कर के परेशानियों का निदान करवा सकता है।

बैंक फ़्रॉड होने पर जेसना ने लॉस एंजिलिस और ठाणे के जिला उपभोक्ता निवारण में भी करवाई शिकायत दर्ज जब कोई व्यक्ति बैंक में अपना एकाउंट खोलता है और इसके लिए कुछ शुल्क वार्षिक देता है। या फायदे पाता है तो वो बैंक से एक तरह की सेवा ले रहा होता है। जो उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के अंतर्गत उपभोक्ता की परिभाषा के मापक पर आता है। ऐसे में बैंक पर कोई साइबर अटैक या ऑनलाइन एकाउंट हैक कर के पैसे उड़ा ले तो ऐसे में जिम्मेदारी सिर्फ बैंक की बनती है या एकाउंट होल्डर की इस से जुड़ा एक मामला सामने आया है। लॉस एंजिल्स में रहने वाली जेसना जोस के पिता ने मुम्बई के एच डी एफ़ सी बैंक से एक प्रीपेड फॉरेक्स प्लस डेबिट कार्ड वर्ष 2007 में लिया था।

वर्ष 2008 में बैंक ने जेसना के पिता से 310 डॉलर की निकासी की कन्फर्म करने को कहा तो उन्होंने निकासी से इनकार कर दिया। बैंक ने 14-21 दिसंबर के बीच 6 हज़ार डॉलर की निकासी की बात जेसना के पिता को बताई। इस पर जेसना ने न सिर्फ लॉस एंजिलिस बल्कि ठाणे के जिला उपभोक्ता निवारण में भी शिकायत दर्ज करवाई। शिकायत प्रक्रिया के बाद फोरम ने यह निर्णय लिया कि इस मामले में सिर्फ बैंक प्रबंधन जिम्मेदार है। उपभोक्ता की कोई गलती नहीं है। राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने इस संदर्भ में एक अहम फैसला सुनाते हुए आयोग के जज सी विश्वनाथ ने क्रेडिट कार्ड की हैकिंग की वजह से उपभोक्ता से हुई धोखाधड़ी के मामले में बैंक प्रबंधन जिम्मेदार है। बैंक की याचिका को खारिज़ करते हुए आयोग ने 6110 अमेरिकी डॉलर (4.46 लाख रुपये लगभग)  12% ब्याज के साथ और 40 हज़ार रुपये मानसिक प्रताड़ना के लिए और 5 हज़ार रुपये केस खर्च के दिलवाए।

ऐसी परिस्थितियों में बैंक की नहीं बनेगी जिम्मेदारी अगर किसी उपभोक्ता का किसी अनाधिकृत ट्रांजेक्शन की सूचना मिली और वो तीन दिन के अंदर अपनी शिकायत दर्ज नहीं करवाता है तो ऐसी में बैंक की जिम्मेदारी नहीं बनेगी। ऐसे में उपभोक्ता को जिम्मेदार माना जाएगा कि उसने क्यो नहीं किसी अनाधिकृत ट्रांजेक्शन या कार्ड खोने की सूचना बैंक को दी या इसी तरह की कोई अन्य जरूरी सूचना।  इलेक्ट्रॉनिक बैंकिंग ट्रांजेक्शन काफी लोगों द्वारा अपना लिया गया है और प्रयोग भी किया जा रहा है। इस से जुड़े नियम भी काफी सख्त कर दिए गए हैं ताकि कोई ठगी की घटना न हो तब भी हर रोज़ हज़ारो लोग ठगी का शिकार हो जा रहे हैं। ऐसे में उपभोक्ताओं को अपने हित की जानकारी होना ज़रूरी है ताकि वक़्त रहते अपने मेहनत की कमाई को सुरक्षित रख सके।

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