एक्टर बनने गए थे मुंबई बन गए बिहार के मंत्री, ऐसे तय किए बॉलीवुड से लेकर राजनीति तक का सफर

Mukesh Sahni Minister Life Story

डेस्क : कोशिश करने बालों की कभी हार नहीं होती , यूं ही किसी की जयजयकार नहीं होती है। ऐसा ही जज्बा पाले एक 18 साल का युवक गरीबी और आर्थिक तंगी के मार से परेशान होकर बिहार के दरभंगा जिले के छोटे से गांव से घर द्वार त्याग कर मुम्बई पहुंच गया और जब घर लौट कर आया तो उस मुकाम को पा चुका था। जहाँ पहुंचने की तमन्ना कितने लोगों को जिंदगी भर में नहीं पुरी हो पाती है। बात बिहार सरकार के वर्तमान मत्स्य एवं पशुपालन मंत्री की हो रही है। कहानी मुकेश सहनी की जो विकासशील इंसान पार्टी के रास्ट्रीय अध्यक्ष हैं। अभी उनकी उम्र 35 साल है। मुकेश सहनी को लोग ” सन ऑफ मल्लाह ” के नाम से भी बुलाते हैं।

मछुआरे के घर जन्म हुआ था आज हैं मंत्री मुकेश सहनी का जन्म दरभंगा जिले के सुपौल बाजार में स्थित एक मछुआरे के घर पर हुआ था। जैसे कि एक आम मछुआरे की जिंदगी होती है कुछ इसी प्रकार की जिंदगी मुकेश साहनी की भी थी। जब मुकेश साहनी 18 साल के हुए तो उनको समझ आ गया कि अगर आते-जाते लड़कों की तरह मैंने भी कुछ नहीं किया तो पूरी जिंदगी मुझे मछली पकड़ना और बेचना पड़ेगा।

पहले कोलकाता में मिली सेल्समेन की नौकरी परिवार में पैसे को लेकर इतनी ज्यादा तंगी रहती थी कि उनको 18 वर्ष की आयु में ही घर छोड़ना पड़ा। मुकेश साहनी का साफ कहना है कि उनका पढ़ाई में मन नहीं लगता था। आज के समय में बिहार का नौजवान मुंबई, दिल्ली और बेंगलुरु जैसे बड़े-बड़े शहरों में जाता है लेकिन एक समय पर उत्तर प्रदेश और बिहार के नौजवान बंगाल जाया करते थे।

बंगाल की राजधानी कोलकाता में उनको खूब काम मिलता था, जिसके चलते मुकेश साहनी ने भी सोचा कि वह कोलकाता जाएंगे। जब वह बंगाल चले गए तो वहां पर उन्होंने सेल्समैन की नौकरी चुन ली। उन्होंने यह नौकरी 6 महीने तक की लेकिन फिर उनको घर की याद आने लगी। वह अपने घर वापस आ गए। घर आते ही हालत फिर वही हो गई, जिसके चलते हैं उनको फिर से घर छोड़कर बाहर जाना पड़ा और उन्होंने मुंबई को अपना ठिकाना बना लिया। उन्होंने इस बार एक जनरल स्टोर में नौकरी की और उनको हर महीने ₹900 मिलने लगे।

फिल्मी है कहानी , फ़िल्म सेट पर चमक गयी जिंदगी जब वह मुंबई गए तो वहां पर उन्होंने अपनी उम्र के लोगों को थियेटर और फिल्म के लिए उत्साहित देखा। साल 2001 में जब देवदास फिल्म की शूटिंग हो रही थी तो शूटिंग के दौरान मुकेश साहनी ने सेट का काम चुन लिया और वह सेट को सजाने लगे, 6 घंटे की शिफ्ट करने वाले आदमी को 500 रूपए मिलता था, जिसके चलते उन्होंने अपनी तीन शिफ्ट कर ली और अब वह 900 रूपए की बजाय दिन का 1500 रूपए कमाने लग गए। धीरे-धीरे करके वह काम सीख गए और फिर आसपास के मजदूरों को भी लाकर काम पर लगवाने लगे।

ऐसे में अब वह सुपरवाइजर के पद पर आ गए और उनकी जेब में अच्छा खासा पैसा आने लगा। इसके बाद हर एक नौजवान की तरह उन्होंने भी सपना देखा कि वह अपनी खुद की कंपनी तैयार करेंगे। उन्होंने अपनी खुद की कंपनी बनाई, जिसका नाम रखा “मुकेश सिने लिमिटेड” ऐसे में उन्होंने पिक्चर लॉन्च की जिसका नाम रखा “एक लैला तीन छैला” लेकिन यह फिल्म पर्दे पर फ्लॉप हो गई। बता दें कि यह पिक्चर भोजपुरी पिक्चर थी जो 2008 में लॉन्च हुई थी लेकिन इस पिक्चर को कुछ खास सफलता नहीं हासिल हो पाई, जिसके कारण मुकेश काफी मायूस हो गए।

बिहार लौटा तो निषाद समाज के उत्थान के कार्यों में जुटे साल 2008 में वह अपने घर यानी कि बिहार की ओर रवाना हो गए बता दें कि अपने गांव में जब उन्होंने कदम रखा तो उन्होंने अपने गांव को उसी तरीके से पाया जिस तरीके से वह उसे 9 साल पहले छोड़ कर गए थे। उनके गांव में साहनी, निषाद, बिंद जैसे कई अति पिछड़ा वर्ग के लोग आते हैं। सबकी आबादी पूरे गांव में 5% है। ऐसे में उन्होंने अपने गांव के लेवल पर निषाद सम्मेलन आयोजित करवाया यह सम्मेलन 2014 में किया गया था। मुकेश सहनी द्वारा सम्मेलन सफल रहा इसके बाद भारतीय जनता पार्टी के नेताओं की निगाह मुकेश साहनी पर पड़ी और फिर सियासत की खिचड़ी पकनी शुरू हो गई। यहीं से भारतीय जनता पार्टी ने उनको सन ऑफ मल्लाह के नाम से बुलाना शुरू कर दिया था।

इसके बाद लोगों के बीच भी चर्चा होने लगी और लोगों ने भी उनको “सन ऑफ मल्लाह” कहकर बुलाना शुरू कर दिया। मुकेश साहनी ने भारतीय जनता पार्टी का जम कर उत्साहवर्धन किया और भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में ही प्रचार किया। ऐसे में मुकेश साहनी ने निषाद समुदाय के लोगों के लिए आरक्षण की मांग उठाई लेकिन उनको सफलता हाथ नहीं लगी। ऐसे में जब उन्हें असफलता हाथ लगी तो उन्होंने बगावत शुरू कर दी, बता दें की बिहार में निषाद बिरादरी के लोगों की जनसंख्या 14% है।

साथ ही यह लोग उड़ीसा और पश्चिम बंगाल में भी रहते हैं। ऐसे में मुकेश साहनी का कहना है की आरक्षण तो इनका हक है और यह इनको मिलना चाहिए। लेकिन इतना सब करने के बावजूद भी वह आरक्षण पाने में नाकामयाब रहे और फिर उन्होंने विकासशील इंसान पार्टी बना ली। निषादों की सबसे ज्यादा जनसंख्या उत्तर बिहार में है और उत्तर बिहार में ही मुकेश साहनी की राजनीति चलती है। फिलहाल मुकेश साहनी को आज भी राजनीति में सफलता हासिल करने के लिए कड़ी मशक्कत करनी पड़ रही है।

किस्मत के धनी मुकेश 2020 का विधानसभा चुनाव तो हार गए फिर भी बने मंत्री मुकेश साहनी 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव में बख्तियारपुर से चुनाव लड़ रहे थे जहां पर उनको हार का सामना करना पड़ा। NDA में उनको 11 सीटें प्राप्त हुई थी जिसमें उन्होंने 4 सीटों पर जीत हासिल की जिसके बाद उनको मंत्री बनने का मौका मिला। मुकेश साहनी ने अपने मंत्री बनने से पहले ट्विटर पर यह ऐलान किया था कि वह माननीय मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के मंत्रिमंडल में शामिल होने से बेहद खुश हैं।

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