May 22, 2022

देश की शीर्ष अदालत सुप्रीम कोर्ट ने दिलाया बेटियों को पिता की संपत्ति में हिस्सा

Court

डेस्क : जनतंत्र में न्यायपालिका का सीधा असर जनमानस के व्यक्तिगत जीवन पर पड़ता है। न्यायपालिका के फैसले आम जीवन से ही जुड़े होते हैं जो उनके लिए ही लिए भी जाते हैं। हाल ही में देश की सर्वोच्च अदालत में पिता की कमाई में बेटियों के अधिकार को लेकर एक बड़ा फैसला दिया है।

शीर्ष अदालत में बेटियों को बेटे या किसी अन्य संबंधी के मामले उस परिस्थिति में ज्यादा हकदार बताया है जब पिता की मृत्यु बिना किसी वसीयतनामा के बनाए हो जाए। जस्टिस एस अब्दुल नज़ीर और कृष्ण मुरारी की बेंच ने कहा कि हिन्दू पुरुष ने अगर कोई वसीयत नहीं बनाई हो तो उसकी मृत्यु के बाद उसके खुद से अर्जित की हुई संपत्ति में बेटा व बेटियो को बराबर का हक़ होगा और जिसे पुत्र न हो तो उसके विरासत व स्व अर्जित सम्पतियों में बेटी का अधिकार चचेरे भाई के मुकाबले ज्यादा रहेगा।

सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के बाद पुराने विवाद सुलझाने में मदद मिलेगी। कोर्ट का आदेश है कि ये फैसला बैक डेट दे लागू होगा। स्पष्ट करते हुए बताया कि 1956 से पहले भी जिनके पिता की मृत्यु हो गई है। उनकी बेटियों को भी इस फैसले से लाभ मिलेगा। वर्ष 1956 में हिन्दू पर्सनल लॉ के तहत हिन्दू सक्सेशन एक्ट बनाया गया था। अब इस आदेश के आने के बाद से 1956 से पहले संपत्ति के बंटवारे को लेकर उन केसों में नया मोड़ आ सकता है जिसमे पिता की संपत्ति में बेटियों को हिस्सेदारी नहीं दी गई है।

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला मद्रास हाई कोर्ट के एक फैसले के खिलाफ लाए गए एक अपील में आया। जो कि हिन्दू सक्सेशन एक्ट के तहत हिन्दू महिलाओं और विधवाओं के सम्पति अधिकारो से संबंधित था। सुप्रीम कोर्ट ने अपने 51 पन्नो की जजमेंट में कहा है कि

” एक व्यक्ति की स्व अर्जित सम्पति, जिसकी 1949 में मृत्यु हो गई,उसकी इकलौती बेटी की हस्तांतरित होगी। भले ही वह व्यक्ति संयुक्त परिवार में रह रहा हो और मृतक व्यक्ति के भाई और उसकी मृत्यु के बाद उसके बच्चो को उत्तरजीविता कानून 1956 के आधार पर हस्तांतरित नहीं किया जा सकता था।”

कोर्ट ने अपना फैसला सुनाते वक़्त परंपरागत मिताक्षरा और दायभाग स्कूल के साथ मरूमक्कथयम, अलियासन्तान और नंबूदिरी कानूनों का भी उल्लेख किया और कहा कि

” यह कानून हिंदुओं के प्रत्येक संप्रदाय चाहे वैष्णव हो, लिंगायत हो, ब्रह्म प्रार्थना समाज, बौद्ध, जैन, सिख इनसब पर लागू होगा। सिर्फ मुस्लिम, ईसाई, पारसी, यहूदी को इस से अलग किया गया है।”

लोकतंत्र में न्याय व्यवस्था का एक अलग ही महत्व है। वक़्त ज़रूरत समाज के मुताबिक नियमों कानूनों में बदलाव की ज़रूरत महसूस होती है। लेकिन हर बार न्यायपालिका द्वारा लाए गए बदलाव से सभी सहमत हो ऐसा ज़रूरी भी नहीं है। तब भी जनहित के लिए कड़े फैसले लेने ज़रूरी रहते हैं।संपति संबंधित सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला जनहित खासकर महिलाओं के लिए काफी पक्ष में है तथा आर्थिक रूप से सशक्त बनाने में मदद करेगा