देश एक बार फिर से लॉकडाउन की तरफ बढ़ा रहा है, नौकरियों की भारी कमी से युवा का भविष्य अनिश्चित

Lockdown Again

डेस्क : देश में कोरोना ने फिर से दस्तक दे दी है। दुबारा से लोगों में चिंता की स्थिती बन गई है। एक तरफ लोगों में कोरोना का डर ख़तम हो गया था और उन्होंने मास्क लगाना छोड़ दिया था, वहीँ दूसरी ओर कोरोना के नियमों का पालन करना भी ख़तम कर दिया था। अचानक आए कोरोना के उछाल में वही लोग प्रभावित हैं जिन्होंने Covid-19 के नियमों का उल्लंघन किया है।

इस वक्त देश में कोरोना से ग्रसित मरीजों के आंकड़े इस प्रकार हैं, बिहार- कुल केस(301304) मृत्य (1675), दिल्ली- कुल केस (784137) मृत्यु (11652), झारखण्ड कुल केस (151272) मृत्यु (1320), महाराष्ट्र कुल केस (3639855) मृत्यु (59153), पंजाब कुल केस (286816) मृत्यु (7722), उत्तर प्रदेश कुल केस (766360) मृत्यु (9480), वेस्ट बंगाल कुल केस (636885) मृत्यु (10480) इन हालातों से ऐसे कुछ सवाल खड़े हो गए हैं जिनसे आम लोगो के दिमाग में कई सवाल पैदा हो गए हैं कि क्या देश फिर से लॉकडाउन की ओर जा रहा है ? क्या देश में हो गई है नौकरियों की कमी ? लोग निकाले जा रहे हैं कंपनियों से ? तो चलिए जानते हैं एक-एक करके स्थिति।

क्या देश फिर से लॉकडाउन की ओर जा रहा है विश्वव्यापी कोरोना महामारी से बीते एक वर्ष से देश की हालत में बदलाव नहीं आ रहा है। कोरोना वायरस के चलते अनेको लोगों के रोज़गार चले गए, आये दिन दवाई की कमी के चलते कई लोगों की जान चली गई। एक समय ऐसा भी आया जब लोग महामारी से उभरने लगे लेकिन कोरोना तो अपना रूप धीरे-धीरे बदलता रहा और कुछ इस तरह विकसित होकर वापस आया की फिर से लॉकडाउन लगाने जैसी स्थिति बना दी।

लोग डरे हुए हैं और जहाँ देखो वहां सिर्फ यही बाते चल रही है की अब क्या होगा ? अब कैसे रहेंगे ? कितने दिन का खाना बचा है ? कई राज्यों में सप्ताह के आखिरी दिनों यानी की वीकेंड लॉकडाउन लग गया है। फिलहाल भारत सरकार ने तैयारी कर ली है और 2-3 वैक्सीन नहीं बल्कि 4 वैक्सीन पफाइज़र, जॉनसन एंड जॉनसन, मॉडेर्ना और नोवा-वैक्स को अप्रूवल मिल सकता है। वैक्सीनेशन के बाद ही अब देश के लोगों का डर ख़तम हो सकता है।

क्या देश में हो गई है नौकरियों की कमी देश में ज्यादा जनसँख्या के कारण पहले से ही नौकरियों में कमी चल रही थी। एक पक्की नौकरी की चाह भी युवा वर्ग के लिए सपना हो गई है, देश में निजीकरण भी बढ़ता जा रहा है, जो अपने आप में चिंता का विषय है। सरकार का साफ़ कहना है की निजीकरण से विभागों की क्षमता बढ़ती है जो देश को चलने के लिए अतिआवश्यक है। बीते वर्ष अप्रैल में 1 करोड़ 70 हज़ार नौकरियां चली गई थी और मात्र 2 महीने के बाद 1 करोड़ 80 हज़ार नौकरियां चली गई। इसके बाद यह सिलसिला बढ़ता चला गया।

जो लोग महीने में तनख्वाह पा रहे थे उनमें 22% की कमी आई है, वहीं दूसरी ओर रेड़ी, पटरी पर काम कर रहे लोगों में इज़ाफ़ा हुआ है। जब लॉकडाउन ख़तम होने लगा तो लोगों की जेब में अनियंत्रित तौर पर पैसा आया। अनियंत्रित पैसा आना किसी भी देश की अर्थव्यवस्था के लिए सही नहीं है। कई लोगों ने अपने खर्च कम कर दिए जिससे बाजार पर फर्क पड़ा। इसका सीधा असर मध्य और छोटे व्यापारियों पर पड़ा। ऐसे में जो लोग कॉर्पोरेट वर्ल्ड से जुड़े थे उनकी भी ख़तम हो गई।

लोग निकाले जा रहे हैं कंपनियों से इलाके के ठेकेदार और सरकार की मौज हो रही है, वहीं दूसरी तरफ 8-10 घंटे की नौकरी करने वाला व्यक्ति परेशान है। कंपनी में कॉस्ट कटिंग करने के लिए वर्क फ्रॉम होम दे दिया गया है। कई लोग ट्रेवल कंपनी में काम कर रहे थे लेकिन अचानक से उनको टर्मिनेशन लेटर थमा दिया गया। कई लोगों का भविष्य नौकरी की अनिश्चिताओं से भर गया है। लोगों ने अपने हालात सुधारने के लिए अच्छी कंपनियों में काम ढूँढा था। लेकिन कम्पनी ने उनका मुसीबत के वक्त पर बिलकुल भी साथ नहीं दिया जिससे वह काफी परेशान हैं। एक स्थिति 2009 में हुई थी जब आर्थिक संकट आया था और एक स्थिति कोरोना महामारी है जहाँ लोग अपने भविष्य की चिंता में डूब गए हैं। यूनाइटेड नेशन के मुताबिक़ पहले ही यह बात कही गई थी की लोगों की करीब ढाई करोड़ नौकरियां चली जाएंगी लेकिन असल आंकड़ों के हिसाब से इससे 3 गुना ज्यादा नौकरियाँ जा चुकी हैं।

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