पितृपक्ष पखवाड़े की शुरुआत होने को, जाने कैसे करें पिंडदान और बिना पिंडदान किये पूर्बजों को प्रसन्न

Pindan

हिंदुओं के लिए काफी विशेष महत्व रखने वाले पितृ पक्ष का पखवाड़ा 10 सितंबर से शुरू हो जाएगा, जिसका की विसर्जन 25 सितंबर को किया जाएगा। पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए पितृ पक्ष में कर्म,तर्पण पिंडदान जैसे कर्म किए एवं करवाए जाते हैं।

माना जाता है कि पितृ पक्ष के समय में यमराज भी आत्माओं को मुक्ति दे देते हैं ताकि वह अपने परिवार के बीच जा कर रहे। यूं तो देश की कई जगह पर पिंडदान किया जाता है। हर जगह का एक अलग महत्व है। लेकिन बिहार के गया में फल्गु नदी के किनारे करवाए गए पिंडदान को सबसे प्रमुख माना जाता है।

महाभारत काल से ही है गया में पिंड दान का विशेष महत्व गया के फल्गु नदी पर पिंडदान का प्रथा सदियों पुरानी है। महाभारत के समय ही कहा गया था कि जो व्यक्ति पितृ पक्ष के समय में फल्गु नदी के तट पर स्नान पिंड दान करके भगवान विष्णु का दर्शन कर लेता है, वह अपने पूर्वजों के ऋण से विमुक्त हो जाता है।

फल्गु के किनारे सारी व्यवस्थाएं इसमें सरकार द्वारा करवाई जाती है। व्यक्ति यहां आकर कर्मकांड अपनी सुविधा और इच्छा अनुसार करवा सकते हैं। पितृपक्ष मेले का आनंद भी उठा सकते हैं। इस वर्ष सरकार द्वारा ऑनलाइन पिंडदान की व्यवस्था भी करवाई जा रही है।

गौसेवा से भी किया जा सकता है पूर्वजों की प्रसन्न पितृपक्ष एक ऐसा अवसर होता है। जब कुछ आसान से उपाय करके भी अपने पूर्वजों को प्रसन्न रखा जा सकता है। इसमें सबसे प्रमुख होता है गौ सेवा करना ।अपनी श्रद्धा अनुसार पूर्वजों के लिए किसी भी गौशाला में जाकर गौ की सेवा की जा सकती है।

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उन्हें चारा पानी दिया जा सकता है। यूं तो दरवाजे पर आई गाय को कभी भी दुत्कारना नहीं चाहिए। लेकिन पितृ पक्ष के समय उसे अपने पूर्वजों का ध्यान कर दरवाजे पर गौ सेवा करना अत्यंत उत्तम माना जाता है। पितरों को प्रसन्न करने और पितृ दोष के निवारण के लिए नित्य प्रति गाय की सेवा के साथ उन्हें गुड़ लगाकर रोटी जरूर देनी चाहिए।

विष्णुपद मंदिर के दर्शन से सम्पूर्ण मानी जाती है पिंड दान की प्रक्रिया गया में पिंडदान की प्रक्रिया में मुख्यतः दक्षिण की तरफ मुख करके चावल के आटे को गूथकर गोला कार पिंड बनाया जाता है। जिसमें गाय का दूध, घी, शक्कर, शहद आदि का मिश्रण रहता है। इसमें काला तिल, जौ, कुछ सफेद फूल आदि मिलाकर जल से विधिपूर्वक तर्पण किया जाता है।

उसके बाद यथाशक्ति ब्राह्मणों को भोजन, दान दक्षिणा करवाना होता है तथा पिंडदान की सारी प्रक्रिया संपन्न करवाने के बाद विष्णुपद मंदिर जाकर भगवान विष्णु के दर्शन करने के बाद ही यह माना जाता है कि पिंड दान की प्रक्रिया संपूर्ण हुई है। भारत मे ख़ास कर बिहारियों में पिंड दान व पूर्वजों के लिए तर्पण करने का विशेस महत्व है। जिसके लिए गया में तैयारियां भी अब लगभग पूरी की जा चुकी है।