रिश्तेदारों से कर्ज लेकर 2 लाख में खड़ा किया बंधन बैंक, आज इतने करोड़ के हैं मालिक

डेस्क : बांग्लादेश के एक गरीब परिवार में जन्मे निजी सेक्टर के बंधन बैंक के संस्थापक चंद्र शेखर घोष का जन्म ग्रेटर त्रिपुरा में 1960 में हुआ था. वह छह भाई-बहनों में सबसे बड़े थें, इनके परिवार में कुल 15 सदस्य थें, इनके पिता मिठाई की एक छोटी सी दुकान चलाते थें, परिवार में सबसे बड़े होने के कारण इन्होंने अपने पिता को आर्थिक तौर पर सहारा देने के लिए दूध बेचना शुरू कर दिया था. इसके साथ ही ये ट्यूशन पढ़ाकर भी कुछ रुपए कमा लेते थे इतने सारे संघर्षों के बीच इन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखी और स्टैटिक्स में ढाका यूनिवर्सिटी से M.A किया. इसके बाद 1985 में ढाका स्थित एक BRAC से जुड़े जो बांग्लादेश के गांव में गरीब महिलाओं को मदद करने वाला इंटरनेशनल ऑर्गनाइजेशन था. बस यही से चंद्र शेखर घोष को कुछ करने की प्रेरणा मिली।

बीते कुछ सालों पहले इन्होंने बंधन बैंक से अपनी हिस्सेदारी बेचकर 10,600 करोड रुपए की रकम हासिल की है.RBI की ओर से दिए गए दिशा निर्देश के तहत बैंक के सीईओ घोष ने यह हिस्सेदारी बेची है. बैंक में अब उनकी 60.95% की बजाय 40% हिस्सेदारी होगी. RBI के नियमों के मुताबिक किसी भी वित्तीय संस्थान में किसी एक व्यक्ति को 40% से ज्यादा की हिस्सेदारी नहीं हो सकती है और से ऐसा न करने के चलते बीते साल RBI ने बंधन बैंक की शाखाओं के विस्तार पर रोक लगा दी.

कैसे मिली इन्हें प्रेरणा ऐसा कहा जाता है कि जब वह ढाका स्थित एक BRAC से जुड़े जो बांग्लादेशी के गांव में गरीब महिलाओं को मदद करने के लिए इंटरनेशनल आर्गेनाइजेशन था इसके बाद से ही इन्हें बंधन बैंक शुरू करने की प्रेरणा मिली। बेहद गरीबी में गुजर कर रही महिलाओं को अक्सर अपने पतियों की प्रताड़ना भी झेलनी पड़ती थी घोष को महसूस हुआ कि यदि इन महिलाओं के हाथों में कुछ आर्थिक शक्ति हो तो हुए अपने और अपने परिवार के जीवन को बदल सकती हैं। विलेज वेलफेयर सोसाइटी के साथ काम कर चुके घोष ने अपने अनुभव को आगे बढ़ाते हुए महिलाओं के लिए माइक्रो फाइनेंस की संस्था शुरू की. इसके बाद उन्होंने 2001 मे महज 2 लाख रुपये से बंधन -कोननगर संस्था की शुरुआत की, यह रकम भी रिश्तेदार से कर्ज के तौर पर ली गई थी इसके जरिए वह गरीब महिलाओं को कम दर पर लोन दिया करते थे।

आखिर क्यों चुना ‘बंधन’ शब्द को यह कहते हैं कि जुड़ाव को दर्शाने के लिए इन्होंने ‘बंधन’ शब्द को चुना और फिर इसी नाम से बैंक की स्थापना की। अपने शुरुआती दिनों के बारे में बात करते हुए कहते हैं, “मैं पश्चिम बंगाल के हुगली जिले में छोटे-छोटे गांव में यात्राएं करता था और महिलाओं को लोन लेने के लिए समझाता था ताकि वे अपने बच्चों को पढ़ा सके, शुरुआत में महिलाएं संदेह की नजर से देखती थी” इसके बाद 2009 में उन्होंने बंधन को नॉन- बैंकिंग फाइनेंस कंपनी के तौर पर स्थापित किया और 2014 में बैंकिंग का लाइसेंस भी इन्होंने हासिल किया।