1 February 2023

जब अकबर ने बदल दिया था बीरबल का नाम, जानिए कैसे महेश दास बना बीरबल

beerbal

डेस्क : मुगल बादशाह अकबर के नवरत्नों की प्रशंसा आज भी होती है, उनकी अपनी अलग महत्ता थी। उन्हीं नवरत्नों में से एक खास थे बीरबल। यदि अकबर की नजर से देखें तो बीरबल का महत्व केवल नवरत्न से कहीं ज्यादा था। इसके पीछे कई कारण थे। बतौर नवरत्न, बीरबल का काम मुगल साम्राज्य सेना और प्रशासनिक कार्यों पर नजर रखना था।

1528 में बीरबल का जन्म उत्तर प्रदेश के काल्पी में एक हिन्दू ब्राह्मण परिवार में हुआ था। बीरबल का असली नाम महेश दास था। बेहद कम उम्र से वो कविताएं लिखने लगे थे, लेकिन उनके व्यंग्य और बातों को समझाने का अंदाज सबसे जुदा था, यही बात उन्हें दूसरों से अलग करती थी।

कविताएं और गीत लिखने की काला से अकबर दूर दूर तक प्रसिद्ध होने लगे थे। हिन्दी, संस्कृत और पर्शियन भाषा की जानकारी होने के कारण इन्हें मध्य प्रदेश के रीवा रिसासत से राजा राम चंद्र ने अपने दरबार में अहम जगह दी थी। उन्होंने बीरबल को ‘ब्रह्म कवि’ की उपाधि दी थी।

ऐसे नाम पड़ा बीरबल :असल में अकबर और बीरबल कब मिले इसपर अलग इतिहासकारों के मत अलग अलग हैं। पर आमतौर पर कहा जाता है कि दोनों की मुलाकात 1556 से 1562 के बीच हुई थी। जिसके बाद ही उन्हें नवरत्नों में शामिल किया गया। अकबर को बीरबल के व्यक्तित्व की कई बातें बेहद पसंद थीं। जैसे- उनकी हाजिर जवाबी. हर सवाल का जवाब देने की कला। कठिन से कठिन परिस्थिति से बाहर निकलने की खूबी और उनकी प्रशासनिक कार्यक्षमता। इन्हीं सब खासियतों के करना उन्हें नवरत्नों में शामिल किया गया था।

अकबर अपने हिन्दू दरबारियों को उनकी सांस्कृतिक पृष्ठभूमि के आधार पर खिताब देने के लिए जाने जाते थे। उन्होंने ही महेश दास को राजा की उपाधि दी और बाद में उसमें बदलाव करके राजा बीरबल कर दिया। बीरबल का मतलब होता है हाजिर जवाब या त्वरित विचारक।

कुछ ऐसे बनें अकबर के प्रिय : ऐसा कई जगह बताया गया है कि शुरू से ही अकबर साहित्य और कला प्रेमी रहे हैं। एक ये भी कारण है की बीरबल अकबर के पसंदीदा नवरत्न थे। बीरबल कई भाषाओं की जानकारी रखते थे। उनकी कविताओं को विशेषतौर पर पढ़ना और सुनना अकबर खास पसंद करते थे। बीरबल ने अकबर के लिए संस्कृत और पर्शियन भाषा में लिखे साहित्य का फारसी में अनुवाद किया। बीरबल की ईमानदारी के अकबर कायल रहे हैं। मुगल साम्राज्य के इतिहासकार अब्दुल कादिर बदायुनी ने लिखा है कि अपने खास तरह के स्वभाव और बुद्धिमता के कारण वो अकबर के चहेते और विश्वसनीय बन गए।

वर्ल्ड एटलस की रिपोर्ट के अनुसार, बीरबल ने करीब 30 सालों तक बतौर धर्म और सेना सलाहकार के रूप में मुगल सल्तनत में काम किया था। जिस समय फतेहपुर सीकरी का निर्माण कार्य चल रहा था तब अकबर ने बीरबल के लिए खास किला बनाने का आदेश दिया था। जिससे दोनों आसपास रहें और जब चाहें मुलाकात हो सके।

बीरबल की मृत्यु से आहत हुए थे अकबर
लेखक शाज़ी ज़मां ने अपनी किताब ‘अकबर’ में लिखा है कि ‘1586 में मुगल सल्तनत के जै़न खो कोका को यूसुफ़ज़ई कबीले को मात देने के लिए तैनात किया गया था। हालात बिगड़ने पर जब उन्होंने फौज की मांग की तो बादशाह अकबर ने बीरबल को मदद करने के लिए भेजा। बीरबल के बाद हकीम अबुल फतह को भी रवाना किया गया। बीरबल के जै़न खां कोका और हकीम अबुल फ़तह से पहले से ही मतभेद थे। उस दौर की जंग में जब हथियारों और पत्थरों से चौतरफा हमला हुआ तो राजा बीरबल की मौत हो गई।’

आपको बता दें राजा मान सिंह की शान में लिखी गई मानचरित्र रासो में इस बात का वर्णन है कि बीरबल की मृत्यु के बाद अकबर पूरी तरह से टूट गए थे थे। उनकी नींद उड़ गई थी और उन्होंने खाना पीना भी छोड़ दिया था।