Bihar का वो बाहुबली जिसके जाने के बाद भी बिहार में उसके किस्से जिंदा रहेंगे

Shahabuddin MP Lalu

डेस्क : बिहार के सिवान के पूर्व आरजेडी सांसद मोहम्मद शहाबुद्दीन का कोरोना से आज शनिवार (मई 1, 2021) को मौत हो गई। शहाबुद्दीन दिल्ली के एक प्राइवेट अस्पताल में आखिरी साँस ली। खैर, अब बात करते हैं शहाबुद्दीन पिछले जिंदगी की। बिहार में शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति होगा। जिसे मोहम्मद शहाबुद्दीन का नाम न सुना हो। खासकर, सीवान के लोगों में तो उसका भय अब तक व्याप्त है। जिन्होंने लालू यादव के जंगलराज के दिनों में उसका आतंक को देखा-सुना है।‌ गौरतलब है कि, पिछले दिनों दिल्ली हाईकोर्ट के निर्देश पर शहाबुद्दीन को 18 घंटों के लिए अपने परिजनों से मुलाकात के लिए समय दिया गया था। उच्च-न्यायालय ने सशर्त पैरोल के तहत उसे सुविधा दी थी। कि वो 6-6 घंटे के लिए दिल्ली में कहीं भी मुलाकात कर सकता है। बता दें कि ये सब चंदेश्वर प्रसाद उर्फ़ चंदा बाबू की मृत्यु के बाद हुआ। जिनके 3 बेटों को शहाबुद्दीन ने मार डाला था।

1980 के दशक से शुरू हुआ आपराधिक तत्वों का बोलबाला: जब शहाबुद्दीन ने चंदा बाबू के दो बेटों को तेजाब से नहला कर मार डाला। इस मामले में उनका तीसरा बेटा गवाह था लेकिन, इससे पहले कि वो अदालत पहुँचता, साजिश के तहत उसकी भी हत्या कर दी गई। लेकिन, इस मामले में आरोपित शहाबुद्दीन को उस समय कुछ नहीं हो पाया। उसके नाम से ही सीवान और आसपास के इलाक़े थर-थर काँपते थे। 1980 के दशक तक सिवान की सियासत में आपराधिक तत्वों का बोलबाला था। एक दौर था, जब तेजाब कांड हो, चंद्रशेखर हत्याकांड हो या सिवान में कोई भी अपराध, शहाबुद्दीन का नाम हमेशा सुर्खियों में रहता था। जिले के अस्पताल हो, स्कूल हों या बैंक या फिर कोई भी दफ्तर…

राजेंद्र प्रसाद के समय मे ही गुंडा बना था शहाबुद्दीन: 80 के दशक में बिहार का सीवान जिला तीन लोगों के लिए जाना जाता था। पहला भारत के प्रथम राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद, दुसरा सिविल सर्विसेज़ टॉपर आमिर सुभानी ‌तथा तीसरा ठग नटवर लाल। आमिर उस समय मुसलमान समाज का चेहरा बने हुए थे। और नटवर के किस्से मशहूर थे, उसी वक़्त एक और लड़का अपनी जगह बना रहा था। शहाबुद्दीन , जो कम्युनिस्ट और बीजेपी कार्यकर्ताओं के साथ खूनी मार-पीट के चलते चर्चित हुआ था। 1986 में हुसैनगंज थाने में इस पर पहली FIR दर्ज हुई थी। और आज उसी थाने में ये A-लिस्ट हिस्ट्रीशीटर है।‌

मात्र 23 की उम्र में 1990 में विधायक बना था: जब लालू प्रसाद यादव मुख्यमंत्री पद के लिए अपनी दावेदारी पक्की कर रहे थे। उसी समय शहाबुद्दीन लालू के साथ हो गया। विधायक बनने के लिए कम से कम 25 उम्र होती है। मगर, फिर ये अपराधी 23 की उम्र में दो बार विधायक बना। और चार बार सांसद। 1996 में केन्द्रीय राज्य मंत्री बनते-बनते रह गया था। वो तो हो गया पर शहाबुद्दीन लालू को जिताने के लिए कुछ भी करने को तैयार था। और लालू इसी प्यार का फायदा उठाकर बिहार में अपहरण एक उद्योग बनाता गया। बिहार में सैकड़ों लोगों का अपहरण हुआ। बिजनेसमैन राज्य छोड़-छोड़ के भाग गए। उस समय कोई भी लोग बिहार आना नहीं चाहता थे।

शहाबुद्दीन पुलिस को कौड़ियों के मोल समझता था: इसकी हिम्मत इतनी बढ़ गई कि पुलिस और सरकारी कर्मचारियों पर इसने हाथ उठाना शुरू कर दिया। मार्च 2001 में इसने एक पुलिस अफसर को थप्पड़ मार दिया। इसके बाद सीवान की पुलिस बौखला गई। एकदम ही अलग अंदाज में पुलिस ने दल बनाकर शहाबुद्दीन पर हमला कर दिया। गोलीबारी हुई, जिसमें दो पुलिसवालों समेत आठ लोग मरे गये। पर शहाबुद्दीन पुलिस की तीन गाड़ियां फूंककर नेपाल भाग गया। शहाबुद्दीन को भागने के लिए उसके आदमियों ने पुलिस पर हजारों राउंड फायर कर घेराबंदी भी कर दी थी। इसके बाद 1999 में इसने कम्युनिस्ट पार्टी के एक कार्यकर्ता को किडनैप कर लिया था। उस कार्यकर्ता का फिर कभी कुछ पता ही नहीं चला। इसी मामले में 2003 में शहाबुद्दीन को जेल जाना पड़ा। इसके जेल जाने के आठ महीने बाद बिना चुनाव प्रचार किए ही 2004 में लोकसभा चुनाव जीत गया । दिलचस्प कि बात ये है 2004 लोकसभा चुनाव में इसके खिलाफ ओमप्रकाश यादव खड़े हुए थे। कुछ वोट भी लाये। परंतु, चुनाव ख़त्म होने के बाद उनके आठ कार्यकर्ताओं का खून हो गया।

कभी पाकिस्तान खुफिया एजेंसी ISI से संबंध रखता था: 2005 में सीवान के डीएम सी के अनिल और एसपी रत्न संजय ने शहाबुद्दीन को सीवान जिले से तड़ीपार किया। एक सांसद अपने जिले से तड़ीपार हुआ। ये बिहार के लिए अनोखा क्षण था। फिर इसके घर पर रेड पड़ी। जिसमे पाकिस्तान में बने हथियार, बम भी मिले। ये भी सबूत मिले कि पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI से इसके संबंध हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इससे पूछा था कि सांसद होने के नाते तुम्हें वैसे हथियारों की जरूरत क्यों है जो सिर्फ आर्मी के पास हैं, ऐेसे हथियार तो सीआरपीएफ और पुलिस के पास भी नहीं हैं।

वकील को भी मारने की धमकी दिया करते थे: इसका घमंड कम नहीं हुआ। इसने जेलर को धमकी दी कि तुमको तड़पा-तड़पा के मारेंगे। सुनवाई पर इसने वकील जज को भी धमकी दे आता था। इसके आदमी जेल के लोगों को धमकाते रहते थे। 2007 में कम्युनिस्ट पार्टी के ऑफिस में तोड़-फोड़ करने के आरोप में इसको दो साल की सजा हुई। फिर कम्युनिस्ट पार्टी के वर्कर की हत्या में इसे आजीवन कारावास की सजा हुई। सिर्फ एक गवाह था इस मामले का उसने बड़ी हिम्मत दिखाई। किसी तरह बच-बचकर रहा था। और इस अपराधी को जेल भिजवाया।

2014 लोकसभा चुनाव से इसके बाहर आने की संभावना बढ़ने लगी थी: 2014 में शहाबुद्दीन फिर लोगों की जबान पर आया‌ गया था। राजीव रंजन हत्याकांड में अपने दो भाइयों की हत्या के वो एकमात्र गवाह थे। उनके दो भाइयों को 2004 में तेजाब से नहलाकर मार दिया गया था। क्योंकि, रंगदारी को लेकर इसके आदमियों और राजीव के भाइयों में बहस हो गई थी। इन लोगों ने बन्दूक दिखाई और राजीव के भाई ने तेजाब दोनों भाई मारे गए। परिवार को पुलिस ने कह दिया कि सीवान छोड़कर चले जाइये। और अब कोर्ट में पेशी से पहले राजीव को मार दिया गया। 2016 में एक पत्रकार राजदेव रंजन की हत्या कर दी गई। उसमें भी इसी का नाम आया। इन दो भाइयों की हत्या वाले मामले में ही इसको बेल मिली है। क्योंकि कोई गवाह नहीं था।

अंत मे 2018 मे शहाबुद्दीन को उम्रकैद की सजा मिली: पटना हाई कोर्ट के 30 अगस्त 2017 को दिए फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने भी मुहर लगा दी थी। चीफ जस्टिस रंजन गोगोई जस्टिस एसके कौल और जस्टिस केएम जोसेफ की पीठ ने 2004 में हुए दोहरे कत्ल के मामले में ये सजा दी है। अगस्त 2004 में शहाबुद्दीन और उसके लोगों ने रंगदारी न देने पर सीवान के प्रतापपुर गांव में चंदा बाबू के दो बेटों सतीश और गिरीश रौशन को तेजाब डालकर जिंदा जला दिया था। इससे पहले पटना हाई कोर्ट ने 9 दिसंबर 2015 को सिवान की विशेष अदालत के दिए फैसले को जारी रखा था। इसमें शहाबुद्दीन समेत चार लोगों को उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी।

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