वर्षों से फरिश्ते की तलाश में शौचालय के रूप में तब्दील हुआ बेगूसराय का यह अनुमंडलीय अस्पताल

Manjhaul Hospital

बेगूसराय : बेगूसराय के पांच अनुमंडल में से एक मंझौल अनुमंडल में निर्माणाधीन अनुमंडलीय अस्पताल महज एक शौचालय बन कर रह गया है. अब इसे किसी फरिश्ते की तलाश है जो इस का उद्धार कर सके. यह बेगूसराय रोसड़ा पथ के समीप मंझौल में स्थित है। सरकार द्वारा स्वास्थ्य सुविधा मुहैया कराने के लिए नए भवनों के निर्माण में करोड़ों रुपए खर्च किए जाने के वावजूद इसका लाभ जनता को नहीं मिल रहा है.

आपको बता दें कि वर्ष 2006-07 में बिहार सरकार के तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री चंद्रमोहन राय ने इस अस्पताल को सरकार से स्वीकृति प्रदान करवा कर अस्पताल का शिलान्यास किया. इसके बाद इस अस्पताल का 4 करोड़ की लागत से दो मंजिले भवन का निर्माण कार्य भी शुरू हो गया. फिर अधिकारियों की मांग के बाद इसकी लागत राशि मे वृद्धि कर 7 करोड़ कर पुनः कार्य शुरू किया गया .वर्षों बाद यह भवन बनकर तैयार हो गया. इसमें टाइल्स , प्लास्टर , वायरिंग तथा सारे खिड़कियों में ग्रिल भी लग कर तैयार हो गया. स्वास्थ्य विभाग द्वारा करोड़ों रुपए का खर्च किया गया, लेकिन विभागीय लापरवाही से निर्माण कार्य रुक गया . जिसके बाद से ही इस भवन के भीतर स्थानीय लोगों के लिए शौचालय, असामाजिक तत्वों का जमावड़ा आदि लगने लगा.

ये महज एक जुआ का अड्डा बन कर रह गया . अब आलम यह हो चुका है इसके भीतर जाना नर्क के दरवाजे पर पैर रखने के बराबर हो चला है। अभी इसकी स्थिति ऐसी हो गई है कि इस अर्धनिर्मित भवनों का छत ,दीवार आदि जर्जर होना शुरू हो गया है. इसके भीतर का आलम ऐसा है कि हर जगह गंदगी, मल मूत्र का अंबार लगा हुआ है। इसके भीतर के लगे सारे टाइल्स, वायरिंग के लगे सभी सामान आदि को असामाजिक तत्वों के द्वारा उखाड़ लिया गया। खिड़कियों के कुछ ग्रिल को भी ले गए। वहीं दूसरी तरफ से कुछ स्थानीय वासियों के द्वारा अतिक्रमण कर लिया गया है।

इसको लेकर स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ताओं की मांग और लाख कोशिशों के बावजूद भी निर्माणाधीन अस्पताल के निर्माण कार्य पूरा करने की दिशा में कोई भी सकारात्मक पहल धरातल पर नहीं देखा जा सका। यह अनुमंडलीय अस्पताल उत्तरी बेगूसराय की सबसे बड़ी अस्पताल के रूप में बनने की कोशिश थी। जिसको लेकर के स्थानीय क्षेत्रवासियों में काफी उत्साह देखने को मिल रहा था, लेकिन अब यह आस टूटती हुई दिख रही है। अगर यह बन जाता तो इस कोरोना काल मे जिन मरीजों को बेहतर ईलाज नही मिलने के कारण अपनी प्राण गमानी पड़ती है। उन्हें यहाँ से बेहतर इलाज मिलता और वो अपनी जिंदगी जीते। आज जो दूसरे जगह मरीजों का आर्थिक दोहन होता है , यहाँ उन्हें उस चीज से छुटकारा मिलता. परंतु ये मंझौल के लिए दुर्भाग्य है कि मंझौल क्रांतिवीरों की धरती होने के वावजूद ये अस्पताल मुँह चिढ़ा रहा है।

कहते है स्थानीय विधायक स्थानीय विधायक राजवंशी महतो ने कहा कि ये बहुत ही दुर्भाग्य की बात है कि बार बार आगाह करने के बाद भी किन्ही नेताओ ने पहल नही की। अगर यह बन जाता तो मंझौल ही नही बल्कि कितने गांव के साथ साथ जिला को संजीवनी देने का कार्य करता। मैं आश्वासन देता हूं कि मैं इसे धरातल पर करके दिखाऊंगा और बहुत ही जल्द लोगों का इस अस्पताल का सपना साकार होगा।

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