आज से शुरू हो गया शिशिर नवरात्र , जानिये क्या है पूजा अर्चना का खास महत्व

न्यूज डेस्क : वैसे तो आमलोगों के बीच आश्विन महीने का प्रसिद्ध शारदीय नवरात्रि प्रचलित है एवं चैत्र मास का बसंत नवरात्र आम लोगों के बीच प्रसिद्ध है, परंतु जिस प्रकार से अध्यात्म एवं दर्शन शास्त्रों में पुरुषार्थ चतुष्टय अर्थात चार पुरुषार्थ अर्थ धर्म काम मोक्ष की चर्चा ही है. उसी प्रकार चार प्रकार के नवरात्र की भी व्याख्या शास्त्रों में मिलती है यह चार नवरात्र मनुष्य को क्रमशः अर्थ धर्म काम एवं मोक्ष को देने वाला होता है. इसके अंतर्गत माघ महीने में होने वाले नवरात्र को शिशिर नवरात्रि या गुप्त नवरात्र भी कहा जाता है।

कमाख्या में होती है विशेष पूजा अर्चना 51 शक्ति पीठों में प्रसिद्ध तांत्रिक साधना एवं सिद्धि का मुख्य केंद्र कामरूप कामाख्या में इस नवरात्र के अनुष्ठान का विशेष महत्व है। शिशिर नवरात्र अर्थात माघ महीने की नवरात्र अंग्रेजी दिनांक के अनुसार 12 फरवरी से प्रारंभ हो रहा है, इसी नवरात्र के मध्य में पंचमी पूजन के दिन को बड़े हर्ष उल्लास से व्यक्ति बसंत पंचमी के रूप में मनाते हुए विद्या की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती की उपासना श्रद्धा पूर्वक करते हैं।इस वर्ष 16 फरवरी को पंचमी तिथि पूरे दिन रहेगी अर्थात बसंत पंचमी सरस्वती- अवतार दिवस के रूप में मनाया जाएगा।

22 फरवरी को विजयादशमी के साथ नवरात्रि की समाप्ति होगी शिशिर नवरात्र अर्थात गुप्त नवरात्रि के मध्य सप्तमी तिथि दिनांक 19 फरवरी को दिन शुक्रवार प्रातः 8:58 तक रहेगी। यह तिथि अचला सप्तमी तिथि विशेष रूप से प्रसिद्ध है। माघ सप्तमी के रुप में ख्याति प्राप्त है इस तिथि को अचला सप्तमी रथसप्तमी,विधान सप्तमी आदि नामों से जाना जाता है इस तिथि को सूर्य सप्तमी भी कहते हैं शास्त्रों में ऐसा कहा गया है कि अरुणोदये स्नानम सूर्य ग्रहण समम गंगायां शत सूर्य ग्रहणसम प्रयागे कोटि सूर्यग्रहणसमफलम अर्थात सूर्योदय काल में अचला सप्तमी के दिन स्नान करने से सूर्य ग्रहण के समय गंगा स्नान का फल प्राप्त होता है विशेष रुप से मिथिला के क्षेत्र में रोग मुक्ति एवं सुख शांति के लिए अचला सप्तमी के दिन स्नान का विशेष महत्व है। अचला सप्तमी के दिन स्नान से मानसिक वाचिक एवं कर्मणा पाप नष्ट होता है,विशेष रुप से 7 मकान के पत्ते सात बेर के पत्ते एवं साथ चिरचिरी के पत्ते को शरीर के विभिन्न अंगों पर रखकर स्नान करने से रोग शोक पाप का नाश होता है। स्नान करने के बाद भगवान भाष्कर सूर्य देव को अवश्य ही जल देना चाहिए ।

ये है मंत्र

।।श्री सूर्य अर्घ मन्त्र।।

।। सप्तसपतेरहः प्रीते सप्तलोक प्रदीपन।
सप्तमी सहितो देव गृहाणार्घ्यं दिवाकरः।।

     ।।प्रणाम मन्त्र।।

।। जननी सर्वलोकनाम सप्तमी सप्तिके। सप्ताव्याहृतिके देवी नमस्ते सूर्य मूर्तये।।

इस प्रकार भगवान सूर्य को अर्घ्य देकर प्रणाम करने के पश्चात दीन हीन विपन्न जरूरतमंदों को दान करना चाहिए।

आचार्य अविनाश शास्त्री
ज्योतिषाचार्य