लखनपुर वाली दुर्गा माता की महिमा है अपरंपार , इस साल कोराना वायरस को देखते हुए नही पड़ेगी बलि

बेगूसराय ( चन्दन शर्मा ) : जिले के भगवानपुर प्रखंड अंतर्गत लखनपुर वाली मां दुर्गा की शक्ति का अपना अलग ही महत्व है .करीब 350 वर्ष पूर्व बंगाल से लाई गई मां दुर्गा की प्रतिमा की पूजा बंगाली पद्धति से की जाती है,इनके दरबार में जो भी श्रद्धालू सच्चे मन से जाते हैं उनकी मनोकामना को मां पूरा करती है, यहां विभिन्न प्रदेश से श्रद्धालु मां के दरबार में अपना हाजिरी लगाते हैं। इस संबंध में पूर्वज बताते है कि बंगाल के नदियाजिले के शांतिपुर से मंडराज सिंह के परिवार के लोगों ने मां को मनाकर लखनपुर लाए थे,लाने में मां की शर्त के अनुसार प्रत्येक कोस पर एक छागड़ की बलि देते हुए यहां लखनपुर में मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित करनी थी।

उसी दिन से यहां बलि प्रथा आरंभ हुआ था यहां प्रत्येक वर्ष हजारो छागरो का बलि दिया जाता है यहां जिउतिया पारन के नवमी के दिन पूजा का संकल्प लिया जाता है, उसी दिन से कलश स्थापित किया जाता है फिर चतुर्थी के दिन वैधानिक ढंग से कलश स्थापित, षष्ठी को बेल पूजन, सप्तमी के रात्रि मे नव पत्रिका बनाकर बलान नदी में प्रवाहित किया जाता है, सप्तमी के दिन भी छागड़ की बलि दी जाती है अष्टमी को भैंसा एवं बकरे का बलि दी जाती है, नवमी को पारा एवम् बकरे का संकल्प होता है ।नवमी की रात्रि में माँ को खुश करने एवं आदेश लेने के लिए पहले फुलहाइस होता है।

इसके बाद बकरे को बलि देना शुरू होता है .दसवी को विधि-विधान के साथ मां का विसर्जन किया जाता है विसर्जन के समय बंगाली परिवार की औरतो के द्वारा माँ को सिन्दूर लगाया जाता है .फिर अपराजिता पूजा के बाद नाव पर सवार होकर उन्हें परंपरा के अनुसार अपने नैहर बगरस ले जाया जाता है फिर अतरूआ होते हुए रूदौली घाट तक ले जाकर पुनः उन्हें अपने धाम लखनपुर घाट पर विसर्जित किया जाता है.परंतु अन्य वर्षों की भांति इस बार कोरोना महामारी के मद्देनजर प्रशाशन के निर्देशानुसार छागरों का बलि नही पड़ेगा एवं मेले में कोई भी किसी प्रकार का दुकान नही लगेगा.साथ ही सोशल डिस्टेंस का कड़ाई से पालन कराने का निर्देश दिया गया है.